जीवन में संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन का और अध्यापन का भी अवसर मिला। कुछ ग्रंथों ने सचमुच सुखद अनुभूतियाँ दीं। लेकिन कुछ ग्रंथों ने केवल मन को ही नहीं, बल्कि पूरे अस्तित्व को गहरे जख्म दिये। बहुत दर्द हुआ। खास कर धर्मग्रंथों को पढते वक्त अपने आप को बहुत ही अपमानित महसूस किया। फिर भी संयम न खोने का निश्चय किया। लेकिन जो पढा है, वह लोगों के सामने रखना अपना कर्तव्य मान कर कुछ न कुछ लिखता रहा। मनुस्मृति के बारे में लिखा। ऐतरेय ब्राह्मण जैसे ग्रंथों के बारे में लिखा। वैदिक धर्मसूत्रों के बारे में लिखा। इन ग्रंथों का अंतरंग अपने ही समाज के भाई-बहनों के विषय में कितनी दुष्टता से भरा हुआ है, यह आधार के साथ दिखाता रहा। वैदिक धर्मसूत्रों पर जो लिखा, वह इसी विचारयात्रा का एक भाग है। इन धर्मसूत्रों में पाये जानेवाले नियम बहुजनों की दृष्टि से जहर से भी जहरीले हैं। इनका विवेचन करना किसी भी तरह से सुखकारक नहीं था। लेकिन उनकी असलियत बहुजनों को मालूम हों, इस भावना से मन को कठोर बनाकर उन नियमों का यहाँ विवेचन किया है।