'गया' को अपने देश का एक अत्यंत पवित्र तीर्थक्षेत्र माना जाता है । इस तीर्थक्षेत्र का नाम 'गय' असुर के नाम से मिला है और उसका पावित्र्य भी उस असुर के चरित्र द्वारा ही प्राप्त हुआ है। अपनी संस्कृति का एक महान असुर । कठोर तपस्या करके पावित्र्य की परिसीमा तक पहुँचा अपना एक पूर्वज ! एक महामानव ! वस्तुतः हमें उसका कितना अभिमान होना चाहिए, हमारे मन में उसके प्रति कितना सम्मान होना चाहिए । खेद की बात यह कि हम इस गयासुर का ही नहीं तो कुल सभी असुरों का ही द्वेष करते हैं, उनके बारे में घृणा रखते हैं, उन्हें दुष्ट, क्रूर, कुरूप मानते हैं, उनकी निंदा करते हैं । गयासुर जैसे पवित्र व्यक्तियों के शत्रुओं ने उनके बारे में हमें बताए मत ही हम सच मानते हैं। मानो हमें स्वयं का दृष्टिकोण ही नहीं, डिठियारापन ही नहीं। अपने ही नीतिमान पूर्वजों का धिक्कार करने की कितनी यह स्वद्वेषी वृत्ति । यह वृत्ति हमें नित्य गुलामी में ही जकडकर रखेगी। कभी भी स्वतंत्र नहीं बनाएगी। जिन्हें यह मालूम नहीं होता कि वे किसके वारिस हैं, उनके आँचल में दूसरा क्या आएगा ?